Beschreibung
Produktdetails
Format
ePUB
Kopierschutz
Ja
Family Sharing
Ja
Text-to-Speech
Ja
Erscheinungsdatum
25.07.2026
Verlag
Sukesh Kumar SrivastavaSeitenzahl
(Printausgabe)
Dateigröße
496 KB
Sprache
Hindi
EAN
9788199526235
"मक्कार" एक सनसनीखेज राजनीतिक-सामरिक थ्रिलर सावधान! यह उपन्यास केवल आपकी कल्पना और रोमांच की भूख को तृप्त करने के लिए लिखा गया है। इसमें उल्लेखित घटनाएँ, पात्र और परिस्थितियाँ काल्पनिक हैं। कृपया इसमें ऐतिहासिक तथ्यों या प्रमाणों की खोज न करें यह एक मनोरंजन प्रधान रचना है। पृष्ठभूमि: पहलगाम की धरती पर भयावहता कहानी की शुरुआत होती है एक दिल दहला देने वाली त्रासदी से जम्मू-कश्मीर के मनोरम स्थल पहलगाम में एक सुनियोजित आतंकी हमला होता है। कुछ खूंखार आतंकवादी और देश के भीतर छिपे गद्दार निर्दोष 26 पर्यटकों को सिर्फ उनके धर्म पूछकर चुन-चुनकर मौत के घाट उतार देते हैं। इस निर्मम हत्याकांड से पूरा देश दहल उठता है। भारत सरकार सीधे-सीधे इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराती है। विश्व समुदाय भी भारत के दावे को गंभीरता से लेता है और पाकिस्तान पर उंगलियाँ उठती हैं। लेकिन पाकिस्तान हमेशा की तरह बेशर्मी से इससे इनकार करता है। कूटनीति से युद्ध तक: जब बात शब्दों से नहीं बनती, तो भारत जवाब देता है क्रियात्मक तरीके से। पाकिस्तान की ज़मीन पर चल रहे नौ आतंकी प्रशिक्षण कैंपों को तबाह किया जाता है। इसके बाद चार दिन तक चलने वाला भारत-पाक युद्ध दुनिया को भारत की नई रणनीति और सख्त नीति का परिचायक बनता है। अखबार की एक गोली, जो पूरे देश को झकझोर देती है वहीं दूसरी ओर, दिल्ली के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'द इन्वेस्टिगेटर' के एडिटर-इन-चीफ श्री सिन्हा पर राजनगर में जानलेवा हमला होता है। हमले में उनकी जान तो बच जाती है, लेकिन वे कोमा में चले जाते हैं। यह वारदात आतंकवाद से लड़ते भारत के आंतरिक सुरक्षा तंत्र पर एक करारा तमाचा प्रतीत होती है। और तभी... एक चौंका देने वाला मोड़ आता है। पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन "TRF" (The Resistance Front) इस हमले की जिम्मेदारी लेता है। पूरे देश की पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और सुरक्षा बल इस हमले की तह तक जाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन हर रास्ता एक अंधी गली में जाकर खत्म होता है। तीन पत्रकारों की खोजी जंग जब सरकारी तंत्र थकने लगता है, तब पत्रकारिता की मशाल लेकर आगे आते हैं तीन निडर योद्धा
- संदीप, अख़बार का निर्भीक चीफ क्राइम रिपोर्टर
- रीतेश, उसका जुझारू सहयोगी सीनियर रिपोर्टर
- और जौहरी, जो अपने नाम की तरह हर बात को परखना जानता है।
ये तीनों अपनी जान हथेली पर रखकर सच्चाई की परतें उधेड़ने निकल पड़ते हैं। राजनगर हमले की जांच करते-करते वे एक ऐसे गहरे षड्यंत्र के जाल में उतरते हैं जहाँ देशद्रोह, राजनीति, आतंक और अंतरराष्ट्रीय साजिशों का घातक संगम है।इनकी जाँच का केंद्र बनते हैं कई सवाल:
- क्या ये लोग उस व्यक्ति तक पहुँच पाएँगे जिसने सिन्हा जी पर गोली चलाई?
- क्या वे उस मास्टरमाइंड को पकड़ पाएँगे जो इस भयावह योजना के पीछे है?
- क्या यह हमला केवल एक आतंकी साजिश था या फिर इसके पीछे था कोई अंतरराष्ट्रीय खुफिया तंत्र?
"मक्कार" विश्वासघात की अंधेरी गलियों में छुपा एक राष्ट्रद्रोही चेहरा उपन्यास का शीर्षक "मक्कार" केवल शब्द नहीं, बल्कि उस मानसिकता और चरित्र का प्रतीक है, जो देश का खाकर उसी की जड़ों में ज़हर घोलने का काम करता है। कहानी उन चेहरों को बेनकाब करती है जो देशभक्ति का मुखौटा पहन कर अंदर ही अंदर गद्दारी की पटकथा लिखते हैं। यह उपन्यास न सिर्फ़ एक रहस्य की परत-दर-परत गाथा है, बल्कि यह भी बताता है कि आज की पत्रकारिता जब सच्चे इरादे से जुटती है, तो वह भी युद्धभूमि में किसी सिपाही से कम नहीं होती। कहानी की विशेषताएँ:
- हर अध्याय एक नया ट्विस्ट लेकर आता है
- संवाद और घटनाएं आपके दिल की धड़कनों को तेज़ करती हैं
- देशभक्ति और जासूसी का अद्भुत मेल
- राजनीति, मीडिया और खुफिया एजेंसियों की भीतरी कार्यशैली का रोमांचकारी चित्रण
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